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DeepMind AI ने 1024-bit RSA तोड़ा: 1600x तेज़, बैंक सेफ!

Suvadip Ghara
By Suvadip Ghara On November 7, 2026
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अरे भाई सुनो, मार्केट में एकदम गदर मच गया है। Google DeepMind के AI एजेंटों ने इंटरनेट की सबसे पुरानी और भरोसेमंद तिजोरी में से एक के ताले की कमजोरी पकड़ ली है — और वो भी इंसानी क्रिप्टोग्राफरों से कहीं तेज़। 6 नवंबर 2026 को DeepMind ने ऐलान किया कि उसके मानव-निर्देशित AI एजेंटों ने 1024-bit RSA एन्क्रिप्शन की दो कमजोरियाँ खोज निकाली हैं। सीधी बात नो बकवास — आपका बैंक अकाउंट, WhatsApp चैट और UPI पेमेंट पूरी तरह सेफ है, क्योंकि ये हमला सिर्फ पुराने, रिटायर हो चुके 1024-bit RSA पर काम करता है। लेकिन जो कहानी यहाँ छिपी है, वो उससे कहीं बड़ी है: AI अब सिर्फ चैटबॉट नहीं रहा, वो गणित की सबसे कठिन पहेलियाँ सुलझाने वाला रिसर्च पार्टनर बन गया है।

इस लेख में हम समझेंगे कि DeepMind के एजेंटों ने आखिर क्या तोड़ा, 1600 गुना तेज़ वाला आँकड़ा सच में क्या मतलब रखता है, और भारत के युवाओं व आम जनता के लिए इसका क्या मतलब है।

क्या हुआ? DeepMind ने क्या तोड़ा?

6 नवंबर 2026 को Google DeepMind के वाइस प्रेसिडेंट ऑफ साइंस Pushmeet Kohli ने एक पोस्ट के ज़रिए दो नए रिसर्च नतीजे साझा किए, जिसका शीर्षक था “Advancing the frontier of cryptanalysis”। इस काम को DeepMind के Dj Dvijotham और Abhradeep Thakurta ने लीड किया, और उनके साथ थे बाहर के मशहूर क्रिप्टोग्राफर Nadia Heninger (University of California San Diego और Inria) और Emmanuel Thomé (Inria)। दोनों नतीजे दो अलग-अलग टेक्निकल पेपर्स में लिखे गए हैं, ताकि दुनिया भर के सिक्योरिटी एक्सपर्ट उन्हें जाँच सकें।

सबसे पहले समझिए RSA क्या है। RSA एक पब्लिक-की क्रिप्टोसिस्टम है, जो 1970 के दशक से डिजिटल दुनिया की रीढ़ है। इसका गणित दो बड़े प्राइम नंबरों पर टिका है — उन्हें गुणा करना आसान है, लेकिन गुणनफल से वापस उन दोनों नंबरों को खोजना बेहद मुश्किल। इसी मुश्किल पर RSA की सुरक्षा खड़ी है। RSA का इस्तेमाल एन्क्रिप्शन, की-एक्सचेंज और डिजिटल सिग्नेचर — तीनों में होता है। डिजिटल सिग्नेचर वो मोहर है, जिससे कंप्यूटर जाँचता है कि कोई सॉफ्टवेयर अपडेट या दस्तावेज़ सच में उसी ने भेजा है, जिसका नाम उस पर लिखा है।

DeepMind के एजेंट इंसानों की निगरानी में काम कर रहे थे — ये पूरी तरह ऑटोनॉमस हमला नहीं था। एजेंटों ने नए तरीके खोजने, उन्हें कोड करके चलाने और डीबग करने में मदद की, और रिपोर्ट्स के मुताबिक वो काम कुछ ही हफ़्तों में पूरा हुआ, जिसमें इंसानी क्रिप्टोग्राफरों को कहीं ज़्यादा समय लगता।

पहली कमजोरी: नकली सिग्नेचर का खेल

पहला नतीजा डिजिटल सिग्नेचर से जुड़ा है। साइन करने से पहले ज़्यादातर स्कीमें मैसेज में पैडिंग जोड़ती हैं — पहले से तय एक्स्ट्रा डेटा, जो मैसेज को एक फिक्स्ड साइज़ के ब्लॉक में ढाल देता है। दशकों से माना जाता था कि पैडिंग जालसाज़ी को मुश्किल बनाती है। DeepMind के एजेंटों ने इससे ज़्यादा तीखा जवाब निकाला: ये इस बात पर निर्भर करता है कि हमलावर साइन किए जाने वाले ब्लॉक का कितना हिस्सा कंट्रोल करता है।

जब हमलावर साइन किए जाने वाले ब्लॉक का लगभग आधा या उससे ज़्यादा हिस्सा कंट्रोल करता है, तो पैडिंग कोई मतलब की सुरक्षा नहीं देती — नकली सिग्नेचर बनाना लगभग उतना ही आसान हो जाता है, जितना बिना पैडिंग वाले सिस्टम पर होता। इस खोज को जाँचने के लिए टीम ने इसे सैंडबॉक्स में पहले से सुलझाई जा चुकी 1024-bit बेंचमार्क की पर चलाया। एजेंटों के बनाए इम्प्लीमेंटेशन ने वही जालसाज़ी पहले के तरीके से 3.5 गुना कम CPU समय में दोहरा दी, और वो भी उस कंप्यूटिंग पावर के हज़ारवें हिस्से से भी कम में, जो असली की को फैक्टर करने में लगती।

और कठिन मामलों के लिए — जहाँ हमलावर ब्लॉक का सिर्फ छोटा सा हिस्सा कंट्रोल करता है, जैसे 32-बाइट का डिजिटल फिंगरप्रिंट — एजेंटों ने एक नया अल्गोरिदम निकाला, जो DeepMind के सैद्धांतिक अनुमानों के मुताबिक पिछले सबसे अच्छे तरीके से लगभग 1600 गुना बेहतर है। यहाँ एक बात साफ़ समझ लीजिए: 1600 गुना वाला आँकड़ा सैद्धांतिक अनुमान है, मापा हुआ नतीजा नहीं। मापा हुआ नतीजा है 3.5 गुना CPU बचत। दोनों एक ही दिशा में इशारा करते हैं — पुराना ताला किताबों में लिखे अनुमान से कमज़ोर निकला।

सितंबर 2026 की मिसाल क्यों अहम है

इससे पहले सितंबर 2026 में University of California San Diego और Inria की टीम ने 1024-bit RSA सिग्नेचर जालसाज़ी का एक डेमो पेश किया था। उन्होंने 2007 से जाना जाने वाला एक अल्गोरिदम इस्तेमाल किया था, और कुल मेहनत लगभग 1,380 CPU-core-वर्षों के बराबर थी, जो कई महीनों और कई टीमों में बँटी हुई थी। DeepMind का काम उसी दिशा में अगला कदम है — AI की मदद से वही काम कहीं कम मेहनत में, और नए अल्गोरिदम के साथ।

दूसरी कमजोरी: थोक में चाबियाँ तोड़ना

दूसरा नतीजा एक अलग एंगल से हमला करता है — एक साथ कई RSA कीज़ को फैक्टर करना। RSA कीज़ लगभग हमेशा स्टैंडर्ड साइज़ में आती हैं, 1024 या 2048 बिट, इसलिए कई एक ही साइज़ की कीज़ पर हमला करने वाला एक बड़ी शुरुआती गणना को उन सब में बाँट सकता है और प्रति की औसत लागत घटा सकता है।

DeepMind के एजेंटों ने एक नया अल्गोरिदम खोजा, जिसकी एसिम्प्टोटिक कॉम्प्लेक्सिटी पहले के किसी भी बैच तरीके से बेहतर है। नतीजा: हर अतिरिक्त 1024-bit की को फैक्टर करने की औसत लागत लगभग 30 गुना कम हो जाती है। मतलब ये नहीं कि पहली की सस्ती हो गई — मतलब ये है कि सौवीं की पहली से कहीं सस्ती पड़ने लगी। जिसके पास पुरानी कीज़ का ढेर है, उसके लिए छूट ढेर के साथ बढ़ती जाती है। इस काम में नंबर फील्ड सीव से जुड़ी तकनीकें इस्तेमाल हुईं।

पुराना बनाम नया: आँकड़े एक नज़र में

पहलूपहले का तरीकाDeepMind के AI एजेंटों का तरीका
सिग्नेचर जालसाज़ी (सैंडबॉक्स टेस्ट)पहले का बेंचमार्क तरीका3.5 गुना कम CPU समय में वही जालसाज़ी दोहराई गई
सिग्नेचर जालसाज़ी (32-बाइट फिंगरप्रिंट)पहले का सबसे अच्छा तरीकालगभग 1600 गुना बेहतर (सैद्धांतिक अनुमान, मापा हुआ नहीं)
बैच फैक्टरिंग (कई कीज़ एक साथ)पहले के बैच तरीकेहर अतिरिक्त 1024-bit की की औसत लागत लगभग 30 गुना कम
सितंबर 2026 का डेमो (UCSD/Inria)लगभग 1,380 CPU-core-वर्ष मेहनतDeepMind का काम उसी दिशा में अगला, तेज़ कदम
1024-bit RSA2013 से नए सिग्नेचर के लिए NIST की मंज़ूरी बंदअब और कमज़ोर साबित — ऑडिट करके हटाना ज़रूरी
2048-bit या बड़ी RSA कीज़आज का स्टैंडर्डइन नतीजों से पूरी तरह अप्रभावित, सुरक्षित

क्या-क्या सेफ है? घबराने की कोई बात नहीं

DeepMind ने खुद साफ़-साफ़ कहा है कि ये नतीजे सिर्फ पुराने 1024-bit RSA पर लागू होते हैं। आज के सिस्टम लगभग हर जगह 2048-bit या उससे बड़ी कीज़ इस्तेमाल करते हैं, और उन पर इन तरीकों का कोई असर नहीं है। ऑनलाइन बैंकिंग, मैसेजिंग ऐप्स, सॉफ्टवेयर अपडेट और डिजिटल करेंसी को कोई खतरा नहीं है। कोई लाइव की तोड़ी नहीं गई — सारे प्रयोग सैंडबॉक्स और सिमुलेशन में हुए, एक ऐसे स्टैंडर्ड पर जिसे अमेरिका की स्टैंडर्ड बॉडी NIST ने 2013 में ही नए सिग्नेचर बनाने के लिए स्वीकार करना बंद कर दिया था। NIST के दस्तावेज़ SP 800-131A (2019 रिविज़न) में 2048 बिट से छोटी RSA की से नए सिग्नेचर बनाना मंज़ूर नहीं है, हालाँकि पुराने सिग्नेचर को वेरिफ़ाई करना अब भी जारी है।

एक और साफ़ बात: इसमें कोई क्वांटम कंप्यूटर इस्तेमाल नहीं हुआ। ये क्लासिकल गणित पर AI की मदद से किया गया काम है। NIST के पोस्ट-क्वांटम स्टैंडर्ड — ML-KEM, ML-DSA और SLH-DSA — इंटीजर फैक्टराइज़ेशन पर निर्भर ही नहीं करते, इसलिए ये नतीजे उन्हें छूते भी नहीं।

आम जनता और भारतीय युवाओं के लिए क्यों है खास?

पहली बात — रिटायर का मतलब गायब नहीं होता। पुराने डिवाइस, साइन किया हुआ फर्मवेयर और लेगेसी सर्टिफिकेट चेन अब भी 1024-bit कीज़ लिए घूम रहे हैं, और उनमें से हर एक अब मापने लायक हद तक कमज़ोर हो गया है। भारत में लाखों छोटे दफ़्तर, पुराने सर्वर और IoT डिवाइस अब भी लेगेसी सेटअप पर चलते हैं। अगर आप IT, साइबर सिक्योरिटी या DevOps में करियर बना रहे हैं, तो “लेगेसी क्रिप्टो ऑडिट” एकदम ताज़ा और माँग वाला स्किल बन गया है — 1024-bit RSA ढूँढो, 2048-bit या उससे बड़ी की पर ले जाओ, या पोस्ट-क्वांटम स्कीम की तरफ प्लान बनाओ।

दूसरी बात — ये AI के रोल में बड़ा मोड़ है। AI अब सिर्फ चैट लिखने या तस्वीर बनाने वाला टूल नहीं रहा; वो रिसर्च एक्सेलरेटर बन गया है। एजेंटों ने सिर्फ पुराने हमले तेज़ नहीं चलाए — उन्होंने नए अल्गोरिदम बनाने, लागू करने और डीबग करने में मदद की, ऐसे नतीजे जो इंसानी क्रिप्टोग्राफरों तक नहीं पहुँचे थे। जो युवा रिसर्च, गणित या साइबर सिक्योरिटी में जाना चाहते हैं, उनके लिए AI-एजेंट के साथ काम करना अब एक करियर स्किल है, कोई साइड हॉबी नहीं।

तीसरी बात — ड्यूल-यूज़ का सच। डिफेंडरों की मदद करने वाली हर तकनीक हमलावरों का काम भी आसान करती है, और DeepMind ने पेपर्स पब्लिक करके ये ज्ञान दोनों के लिए खोल दिया है। ओपन सिक्योरिटी रिसर्च का यही सौदा है — और ये सौदा डिफेंडरों के हक़ में तभी रहता है, जब डिफेंडर सच में पैच करते हैं। घड़ी अब थोड़ी तेज़ टिकने लगी है।

अब क्या करें? 5 कदम जो आज ही उठाएँ

  1. अपने सिस्टम का ऑडिट करें: सर्वर, सर्टिफिकेट और पुराने डिवाइस में कहीं 1024-bit RSA तो नहीं चल रहा — खासकर सिग्नेचर वाली जगहों पर।
  2. 2048-bit या उससे बड़ी की पर जाएँ: जहाँ भी 1024-bit RSA मिले, उसे 2048-bit या बड़ी की से बदलें; नए सिग्नेचर के लिए यही आज का स्टैंडर्ड है।
  3. पोस्ट-क्वांटम की तरफ देखें: लंबे समय के लिए NIST के ML-KEM, ML-DSA और SLH-DSA जैसे स्टैंडर्ड्स पर नज़र रखें — ये फैक्टरिंग वाले हमलों से अछूते हैं।
  4. पुराने फर्मवेयर और सर्टिफिकेट चेन जाँचें: रिटायर सिस्टम में छिपी 1024-bit कीज़ सबसे बड़ा रिस्क हैं, क्योंकि उन्हें कोई देखता नहीं।
  5. AI-एजेंट स्किल्स सीखें: अगर आप साइबर सिक्योरिटी या रिसर्च में हैं, तो AI एजेंटों के साथ गणितीय समस्याएँ सुलझाना सीखें — यही अगली बड़ी स्किल है।

निष्कर्ष

DeepMind के AI एजेंटों ने पुराने 1024-bit RSA की दो कमजोरियाँ उजागर करके एक बात सीना ठोक के साबित कर दी है — AI अब गणित की गहराई में उतरकर ऐसे नतीजे निकाल सकता है, जो इंसानों से छूट गए थे। सिग्नेचर जालसाज़ी 3.5 गुना कम CPU में दोहराई गई, 32-बाइट फिंगरप्रिंट वाले मामलों में सैद्धांतिक तौर पर 1600 गुना सुधार का अनुमान है, और बैच फैक्टरिंग में हर अगली की की लागत 30 गुना घटी है। लेकिन असली खबर ये नहीं है कि पुराना ताला टूटा — असली खबर ये है कि ताला तोड़ने वाला अब AI है, और वो हर दिन तेज़ हो रहा है। आपका बैंक, आपका फोन और आपका डेटा आज सेफ है, क्योंकि 2048-bit RSA इन हमलों से अछूता है। सवाल सिर्फ इतना है कि पुराने कोने-कोने में छिपी 1024-bit कीज़ को हम कितनी जल्दी बदलते हैं — और AI-एजेंट वाली इस नई रिसर्च दुनिया में भारत के युवा कितनी जल्दी अपनी जगह बनाते हैं।

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विस्तृत अंग्रेज़ी रिपोर्ट यहाँ पढ़ें: DeepMind’s AI agents found two cracks in legacy 1024-bit RSA — AI Frontier Post

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